पोला पर्व के संस्कारों ने भारत को कृषि प्रधान देश बनाया – शिवदत्त उपाध्याय

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धमतरी | पोला पर्व हमारी भारतीय पर्वो में से एक महत्वपूर्व पर्व है पोला पर्व मानवी जीवन के व्यवहारिक ज्ञान – कर्म के प्रति सजगता को प्रत्येक घर के बालक – बालिकाओ में प्रदान करता है साथ ही आगामी जीवन के प्रति अपने कर्तव्यबोध से जोड़ने का कार्य करती है |


प्रत्येक घर के किसान भाई अपने किसानी में निंदाई – गुड़ाई पश्चात मान्यतानुसार फसलो में पोला पर्व की पूर्व रात्रि में फसलो में अन्न विद्यमान जिसे अन्न फूटने की रात्रि भी कहते है उस रात्रि गांव व क्षेत्र के पुजारी बैगा रात्रि में कृषि क्षेत्र में जाकर गांव के देवी देवता की पूजा करते है इसीलिए पोला दिवस में किसान अपने खेतों में नही प्रवेश करते और फसलो में अन्न पड़ने व अपने परिश्रम के अच्छे प्रतिफल प्राप्त होने की खुशी में सुबह घर के बैलो के स्नानादि कराने व उनकी साज सज्जा कर उनकी पूजा कर घर मे बनी पकवान आदि की भोग अर्पित कर उनके प्रति कृतज्ञता हृदय से करते है साथ ही बालको में कृषि संस्कार व बैलो की योगदान व उनके माध्यम से अपने कर्म को संस्कार स्वरूप जीवन मे लाने हेतु मिट्टी या काष्ठ की बैल से उन्हें जोड़कर उन्हें आनंद और उत्साह से चलाने की परम्पराओ से जोड़ने का कार्य कर आगामी कृषि जीवन मे बैल की महत्व और उनकी आवश्यकता कोअपने जीवन मे धारण कर उनके महत्व को सम्मान देने के लिए किया जाता है|


वही घर की मातृशक्तिया पुरुषों की परिश्रम से प्राप्त होने वाली फसलों की खुशी में शामिल होकर पर्व स्वरूप मिष्ठान बनाती है और पूरा घर इस पर्व को आनंदपूर्ण मानते है इसी संस्कृति से बालिकाओ को जोडने मिट्टी की रसोई में उपयोग लाने वाले बर्तन स्वरूप खिलौने से खिलाते है जिससे उन्हें ज्ञान प्राप्त हो कि किस बर्तन का क्या उपयोग किस व्यंजन के लिए किया जाता है जो रसोई ज्ञान के साथ ही यह यह भी यह भी बताया जाता है कि पूरे परिवार की खुशी में मातृशक्तियों की व्यवहारिक सहभगिता होती है जो उनके आने वाले जीवन मे बहुत जरूरी होता है
भारतीय इन्ही संस्कारो व कर्मो से विश्व मे भारत कृषि प्रधान देश की मान्यता से मान्य है
एक दंतकथानुसार भगवान विष्णु जी के कृष्णवतर में कंश द्वारा कृष्ण वध करने पोलासुर नामक असुर को भेजा था जिसका श्रीकृष्ण जी ने वध किया था उसी से उस तिथि को पोला कहा जाने लगा !
इस पावन पर्व अवसर पर किसान भाईयो से अपील है कि वे विज्ञान युग मे कृषि सुविधा व उत्पाद में विज्ञान के दिये संसाधनों का उपयोग करे परंतु किसी तरह भी बैल का चाहे छोटे स्वरूप में कृषि कार्य व भारतीय संस्कृति को जीवंत रखने मे उनकी उपयोगिता कायम रखें – कृषि कार्य मे बैलो की उपयोगिता कम या कहे न के बराबर होने से बछड़े – बैलो की महत्व कम होकर आजकल सिर्फ इन्हें कसाईयो के हाथों कटने के काम हो रहे है इससे हमारी संस्कृति विलुप्त होकर सिर्फ एक दिन खिलौने स्वरूप ही रह जाने का खतरा मंडराने लगा है सरकारों से भी अपील है कि इसके लिए कोई न कोई योजनामध्यम से किसानों को उत्साहित करने जैसे ट्रेक्टर व अन्य संसाधनों में छूट या सहयोग प्रदान करती है वैसे ही बैलो के प्रयोग व खरीदने पर सहयोग प्रदान करें जिससे किसान उत्साहित होकर बैल अपने घरों में अवश्य रखें !