रानी लक्ष्मीबाई की वीरता के किस्से भारतीयों के दिलों में ही नहीं, अंग्रेजों की किताबों में भी लिखे गए

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मगरलोड| मगरलोड स्थित गायत्री मंदिर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने देश के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन की महानायिका वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की  185वीं जयंती मनाई।  कार्यकर्ताओं ने गायत्री मंदिर में दीप प्रज्वलित कर वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के चित्र पर माल्यार्पण कर उनके व्यक्तित्व को याद किया। मंदिर में मौजूद कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए महाविद्यालय प्रमुख कु. मोनिका साहू ने कहा कि देश की प्रथम आज़ादी की लड़ाई की महानायिका रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवम्बर 1835 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर के भदैनी ( अस्सी घाट ) मुहल्ले में हुआ था। उनकी शादी झांसी के राजा गंगाधर राव से हुई थी |उस समय अंग्रेजो का शासन था | रानी लक्ष्मीबाई ने देश को आज़ाद करने के लिए अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी और लड़ते-लड़ते 17 जून 1857 को मात्र 22 साल की उम्र में शहीद हो गई ।वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने देश की आज़ादी की शुरुआत की थी और 90 साल बाद यानी 1947 में देश आज़ाद हो गया |

आज भी लोग रानी लक्ष्मीबाई की गाथा गाते है कि बुंदेलो के हर बोलो के मुंह  हमने सुनी कहानी थी ‘ खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।  छत्तीसगढ़ – झारखंड प्रान्त के जनजाति छात्र कार्य प्रमुख प्रमोद राऊत  ने कहा कि 19 नवंबर की तारीख न सिर्फ झांसी और बनारस बल्कि पूरे देश के लिए एक गौरवपूर्ण तारीख है, क्योंकि इस दिन इतिहास में महिला सशक्तिकरण की मिसाल रानी लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ था| जिनकी वीरता के किस्से भारतीयों के दिलों में ही नहीं, अंग्रेजों की किताबों में भी लिखे गए । इस अवसर पर धमतरी जिला संगठन मंत्री चंदराम साहू, नगरमंत्री खूबचंद साहू, दानेश्वर देवांगन, हिरामन, खोमेश, वीरमणि, जयप्रकाश, कु.खुशबू, कु. झामिन, कु.ललिता, गीतेन्द्र सहित अनेक लोग उपस्थित रहे|

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