भगवान को प्राप्त करना है तो अपने माता-पिता की सेवा करें : विजयानंद गिरी

207

धमतरी। दुर्लभ सत्संग समिति द्वारा दुर्लभ सत्संग प्रवचन के चतुर्थ दिवस ऋषिकेश उत्तराखंड से पधारे स्वामी विजयानंद गिरी महाराज जी ने कहा कि सत्संग मिलना भगवान की कृपा का माध्यम है। तत्व दो है-पहला नाशवान, दूसरा अविनाशी। नाशवान तत्व को प्राप्त करने के लिए चौरासी लाख योनी है। लेकिन अविनाशी तत्व को प्राप्त करने के लिए मात्र एक मानव है। मानव नाशवान है। मानव भोग योनी है। इसलिए मानव नाशवान है।
पाप की परिभाषा करते हुए महाराज जी ने कहा कि सिंह किसी को भी फाड़कर खा जाए तो उन्हें पाप नहीं लगेगा किन्त मानव यदि चिंटी को भी मार दे तो उसका भंयकर पाप लगेगा। आपके भाग्य में जो लिखा है आपको उतना ही मिलेगा। अगर शास्त्र विरूद्ध कोई काम करेगा उसका परिणाम भंयकर होगा। शास्त्रार्थ में दो महापाप बताये गये है-पहला ब्राम्हण की हत्या करना, दूसरा मदिरापान करना। जो व्यक्ति माता-पिता की सेवा करता है उसे तीर्थ जाने की आवश्यकता नहीं है। माता-पिता स्वयं तीर्थ है। आज मनुष्य का ध्यान अधिकार के तरफ ज्यादा है किन्तु कर्तव्य के तरफ ध्यान नहीं रहता। जो व्यक्ति अपने अधिकार को कृतित्व के रूप में देखता है तब तक उसका मर्यादा बना रहता है। जो व्यक्ति माता-पिता की सेवा करता है उसकी सेवा से भगवान भी खुश होकर उन्हें दर्शन देने आने को मजबूर हो जाते है। जो व्यक्ति अपने माता-पिता को दुख देता है वह महापापी है। माता-पिता के कर्ज को व्यक्ति सात जन्मों में भी नहीं चुका सकता है। यदि भगवान को प्रसन्न करना है। भगवान को प्राप्त करना है तो अपनी माता-पिता की सेवा करें। भगवान ने माता-पिता के रूप में अपना अंश इस धरती पर भेज दिया है।