भगवान को पाने के लिए मन रंगा होना चाहिए न कि तन, ऑनलाइन सत्संग का श्रद्धालु ले रहे लाभ

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धमतरी |भक्तों की जिज्ञासाओं एवं प्रश्नों के समाधान एवं मधुर आनंद मय भजनों से युक्त, ज्ञान की अद्भुत धारा लिए हुए भगवान की भक्ति की गंगा में डुबकी लगाते हुए ऑनलाइन सत्संग का आयोजन प्रतिदिन संत राम बालकदास जी द्वारा उनके सीता रसोई संचालन ग्रुप में प्रातः 10से 11 बजे और दोपहर 1 से 2 बजे किया जाता है| आज की सत्संग परिचर्चा में भोलाराम साहू ने जिज्ञासा रखी| प्रेम भाव एक चाहिए भेष अनेक बनाएं, चाहे घर में बास कर चाहे बन को जाए प्रकाश डालने की कृपा करें| इस विषय को स्पष्ट करते हुए बाबा जी ने बताया कि भगवान की भक्ति पाने के लिए कुछ लोग रंग-बिरंगे वस्त्र धारण कर लेते हैं |कभी कुछ तो कभी कुछ करते हैं| कबीर दास जी ने कहा है कि भगवान को पाने के लिए आंख-कान  मूंदकर समाधि लेने की जरूरत नहीं बल्कि जो प्रतिदिन कर्म हम करते हैं वही भजन बन जाए |आप जो दिनचर्या करें चाहे भोजन करे, निद्रा लें, वार्तालाप करे, सब में भगवान की भक्ति का पुट जोड़ो ताकि भगवान की भक्ति हर पल आपके हृदय में स्थापित रहे | आप हर क्षण को पूजा बना सको, इसके लिए आपको रंग-बिरंगे वस्त्र धारण करने की कभी आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी| भगवान को पाने के लिए आपका मन रंगा होना चाहिए ना कि तन| गृहस्थ जीवन में रहकर भी जो भगवान को भजे वही संत है| रामफल जी ने रामचरितमानस की चौपाई “राम से अधिक राम कर दासा…. के भाव को स्पष्ट करने की विनती की| बाबाजी ने बताया कि रामचरितमानस में स्पष्ट रूप से गोस्वामी तुलसीदास ने वर्णन किया है कि राम जी की भक्ति से भी अधिक उनके नाम के जाप का महत्व है इसके लिए उन्होंने विभिन्न उदाहरणों को भी प्रस्तुत किया है | रामसेतु बनाते समय राम जी के नाम से पत्थरों का समुद्र के ऊपर तैर जाना|  जिस भी भक्त के हृदय में स्वयं भगवान राम का नाम निवास करता हो वह व्यक्ति भगवान राम से भी ऊपर क्यों  नहीं होगा |यही इस चौपाई के भाव है| ऋचा बहना ने जिज्ञासा रखी कि गुरु बिना ज्ञान नहीं और ज्ञान मिला कल्याण नहीं इस भाव को स्पष्ट कीजिये | बाबाजी ने बताया कि संसार में आज गुरा ओर निरगुरा पर  विचार चल रहा है| कुछ लोग कहते हैं कि कंठी पहन लो, कान फुका लो बस बन लिए गुरु, परंतु ऐसा नहीं है और  लोग यह भी सोचते है कि हमने गुरु बना लिया तो हमारा कल्याण हो गया और यह लोग जो लोग गुरु नहीं बनाते उनका अपमान भी कर देते हैं| वास्तव में गुरु बनाने का अर्थ है जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए | जिनको हम अपने जीवन में आदर्श मानते हैं वही हमारा गुरु है| सत्य ही गुरु  है | गुरु  के बिना  बिना ज्ञान नहीं है और ज्ञान बिना कल्याण नहीं है| ब्रह्मा, विष्णु महेश को भी अपने कल्याण हेतु गुरु की आवश्यकता पड़ी थी| गुरु स्वयं में एक शब्द है जो कि तत्व है| कल्याण शब्द से अभिप्राय अपना भला करते हुए पूरे जग का भला सोचे | गुरु हमें  ज्ञान देता है कि हमें अपना कल्याण करते हुए जग का भी कल्याण अवश्य करना चाहिए| रोम साहू ने रामचरितमानस की चौपाइयां “सुनु सर्वज्ञ “के भाव को स्पष्ट करने की विनती बाबाजी से की| बाबाजी ने बताया कि तुलसीदास ने सुंदर अलंकारों का उपयोग इन चौपाइयों में किया है| गोस्वामी तुलसीदास जी श्री ठाकुर जी के लिए कह रहे हैं कि स्वामी आप सेवक के लिए सूर तरू और सूर धेनु के समान है अर्थात उनकी सारी इच्छाएं पूर्ण करते हैं और जो इच्छा वह नहीं करते उनको भी आप पूर्ण करते है|