नगरी में शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त, 76 सरकारी स्कूल सिर्फ एक-एक शिक्षक के भरोसे, तीन हजार बच्चों का भविष्य अंधकार में

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आदिवासी कांग्रेस जिलाध्यक्ष मनोज साक्षी ने जताई गंभीर चिंता, कहा आदिवासी क्षेत्र में शिक्षा व्यवस्था पर ध्यान नहीं दे रही सरकार

नगरी। नगरी विकासखंड की शिक्षा व्यवस्था की बदहाली ने सिस्टम की पोल खोल दी है। जल, जंगल, जमीन संघर्ष समिति के प्रमुख, आदिवासी कांग्रेस के जिला अध्यक्ष एवं पूर्व जिला पंचायत सदस्य मनोज साक्षी ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि नगरी ब्लॉक के 76 सरकारी स्कूल केवल एक-एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। इसमें 50 प्राथमिक शाला और 26 मिडिल स्कूल शामिल हैं। इस गंभीर स्थिति के कारण क्षेत्र के लगभग 3000 से अधिक स्कूली बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ गया है। मनोज साक्षी ने शिक्षा का अधिकार कानून आरटीई का हवाला देते हुए कहा कि आरटीई एक्ट के तहत 30 बच्चों पर 1 शिक्षक अनिवार्य है लेकिन नगरी ब्लॉक में हालात ये हैं कि एक शिक्षक को एक साथ 5 कक्षाओं को संभालना पड़ रहा है। वही शिक्षक हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान सब विषय पढ़ाएगा। इसके अलावा मिड-डे-मील की व्यवस्था, शाला का पूरा डाक कार्य, चुनाव ड्यूटी, बीएलओ का काम भी उसी एक शिक्षक के जिम्मे है। ऐसे में सवाल उठता है कि बच्चों की गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई कब और कैसे होगी? मनोज साक्षी ने इसे नक्सल प्रभावित आदिवासी अंचल की शिक्षा पर सीधा हमला करार दिया। उन्होंने कहा कि नगरी-सिहावा क्षेत्र पहले से ही गरीबी और अशिक्षा से जूझ रहा है। अब अगर स्कूल में शिक्षक ही नहीं होगा तो पालक अपने बच्चों को स्कूल क्यों भेजेंगे? इसका सबसे बुरा असर आदिवासी लड़कियों की शिक्षा पर पड़ेगा। लड़कियां सबसे पहले स्कूल छोड़ने को मजबूर होंगी। उन्होंने आगे आगाह किया कि आज जो बच्चे बुनियादी शिक्षा से वंचित रह जाएंगे, 10 साल बाद यही बच्चे बेरोजगार होकर महानगरों की ओर पलायन करेंगे या फिर भटक कर गलत रास्ते पर चले जाएंगे। क्या प्रदेश सरकार आदिवासी अंचल के बच्चों के लिए यही भविष्य चाहती है?

सरकार के सामने रखीं 4 सूत्रीय मांगें

शिक्षा की इस भयावह स्थिति को सुधारने के लिए मनोज साक्षी ने सरकार के सामने 4 सूत्रीय मांग पत्र रखा है। नगरी विकासखंड को ‘विशेष शिक्षक भर्ती जोन’ घोषित किया जाए। स्थानीय शिक्षित युवाओं को प्राथमिकता देते हुए अगले 3 माह के भीतर सभी रिक्त पदों पर शिक्षकों की पदस्थापना सुनिश्चित की जाए। नगरी जैसे दूरस्थ और नक्सल प्रभावित क्षेत्र में शिक्षकों को रोकने के लिए ‘दूरस्थ क्षेत्र भत्ता’ दोगुना किया जाए। वर्तमान में शिक्षक यहां जॉइन करते ही कुछ महीनों में ट्रांसफर करा लेते हैं, जिससे पद फिर से खाली हो जाते हैं। जिला शिक्षा अधिकारी धमतरी की जवाबदेही तय की जाए कि उनके जिले में शिक्षा का अधिकार अधिनियम का खुला उल्लंघन कैसे हो रहा है और इतने बड़े पैमाने पर स्कूल शिक्षक विहीन क्यों हैं। सरकार की युक्तियुक्तकरण नीति पूरी तरह विफल साबित हुई है। शहर के स्कूलों में शिक्षक सरप्लस यानी जरूरत से ज्यादा हैं, जबकि नगरी जैसे दूरस्थ गांवों के स्कूल शिक्षकों के लिए तरस रहे हैं। इस नीति को तत्काल बंद किया जाए।

डिजिटल इंडिया के दावों की नगरी क्षेत्र में हवा निकल रही

मनोज साक्षी ने राज्य सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि इन मांगों पर शीघ्र ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो वे इस गंभीर मुद्दे को पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के माध्यम से आगामी विधानसभा सत्र में प्रमुखता से उठवाएंगे। उन्होंने कहा कि सीतानदी-उदंती टाइगर रिजर्व के नाम पर नगरी के 60 गांव पहले से ही सड़क, बिजली, स्वास्थ्य, मोबाइल नेटवर्क जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। अब बच्चों से उनका पढ़ने का मौलिक अधिकार भी छीना जा रहा है। आदिवासी अंचल पर यह दोहरी मार किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सरकार पर हमला बोलते हुए साक्षी ने कहा कि एक तरफ सरकार डिजिटल इंडिया और स्मार्ट क्लास की बड़ी-बड़ी बातें करती है, दूसरी तरफ नगरी के स्कूलों में बच्चों को ब्लैकबोर्ड पर पढ़ाने वाला शिक्षक तक नसीब नहीं है। जब बुनियादी शिक्षा ही नहीं मिलेगी तो आदिवासी बच्चे डिजिटल दुनिया से कैसे जुड़ेंगे? सरकार का यह कैसा विकास मॉडल है जहां शिक्षा का अधिकार ही खतरे में है।