दुनिया देख रही है भारत का दम, हैदराबाद में देसी वैक्सीन क्षमता की बानगी देखने पहुंचे 64 देशों के राजनयिक

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नई दिल्ली| भारत अपनी वैक्सीन निर्माण और उत्पादन क्षमता की एक बानगी दुनिया के सामने पेश करेगा. इस कड़ी में दुनिया के करीब 64 देशों के राजदूत और वरिष्ठ राजनयिकों को बुधवार सुबह हैदराबाद ले जाया गया है. विदेशी राजनयिकों को कोरोना वैक्सीन बनाने वाली भारत बायोटेक और बायोलॉजिकल-ई जैसी देसी कंपनियों को दिखाया जाएगा. विदेश मंत्रालय की मेजबानी में हैदराबाद पहुंचे विदेशी राजनयिकों का दल भारत-बायोटेक और बायोलॉजिकल-ई जैसी कंपनियों में वैक्सीन निर्माण क्षमताओं की बानगी पेश की जाएगी. दोनों ही कंपनियां कोरोना महामारी के खिलाफ वैक्सीन निर्माण और उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.

भारत बायोटेक ने जहां कोवैक्सीन नामक टीका विकसित किया है वहीं बायोलॉजिकल-ई कम्पनी के साथ अमेरिका के ओहायो स्टेट इनोवेशन फंड ने नई वैक्सीन तकनीक में साझेदार बनाई है. सभी आमंत्रित राजनयिकों को बुधवार सुबह एयर इंडिया की एक विशेष उड़ान से हैदराबाद ले जाया जाया गया है. भारत की वैक्सीन राजधानी कहलाने वाले हैदराबाद में विदेशी राजदूतों का दल उस जीनोम वैली इलाके में जाएगा जहां भारत-बायोटेक और बायोलॉजिकल-ई समेत कई देसी कंपनियां हैं. आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक इस दौरे के सहारे भारत की कोशिश जहां अपनी वैक्सीन उत्पादन क्षमताओं की बानगी दिखाने की होगी. वहीं देसी कोविड19 टीकों के लिए बाजार तलाशने का भी प्रयास होगा। इस दौरे की तैयारियों से जुड़े एक अधिकारी के म्युताबिक उस तरह के दौरे के सहारे स्वाभाविक रूप से इस बात की कोशिश होगी कि अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य एशिया के मुल्कों में भारतीय टीकों के लिए सम्भावित खरीददारी भी मिल सकें. आमंत्रित राजनयिकों के दल में इस लिहाज से विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व शामिल किया गया है. सूत्रों के अनुसार, इस दल में अमेरिकी दूतावास की तरफ से उनके स्वास्थ्य प्रतिनिधि शामिल हैं, जबकि पड़ोसी मुल्कों में श्रीलंका, म्यांमार, भूटान, बांगलादेश, मालदीव. जबकि विस्तारित पड़ोस में ईरान भी इस दल का हिस्सा है, लेकिन चीन और पकिस्तान इसका हिस्सा नहीं हैं. इसके अलावा मध्य एशिया में किर्गीज़स्तान, अज़रबैजान को भी शरीक किया गया है. वहीं यूरोप से हंगरी, आइसलैंड, डेनमार्क, चेक रिपब्लिक आदि और दक्षिण पूर्व एशिया- कम्बोडिया, मलेशिया, सिंगापुर समेत कई देश शामिल हैं. अफ्रीका के इलाके से इथियोपिया, नाइजीरिया, मिस्र, चाड, नाइजर के अलावा अनेक मुल्क हैं. साथ ही लैटिन इलाके के देशों में ब्राज़ील, मेक्सिको, एल सल्वाडोर, बोलिविया जैसे देश हैं. पूर्वी एशिया से दक्षिण कोरिया और दक्षिण क्षेत्र से ऑस्ट्रेलिया भी शामिल है. बीते कुछ दिनों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय वैक्सीन निर्माण क्षमताओं को काफी उल्लेख कर रहे हैं. राजनयिकों के इस दौरे से पहले बीते दिनों पीएम मोदी ने जहां हैदराबाद और पुणे जाकर वैक्सीन उत्पादन क्षमताओं पर खुद जानकारी ली. वहीं पिछले महीने ब्रिक्स जैसे मंचों पर भी मोदी कह चुके हैं कि भारत की क्षमताओं का उदाहरण पूरी दुनिया ने कोविड-19 के दौरान देखा था, जब भारतीय फार्मा उद्योग की क्षमताओं के कारण ही 150 से अधिक देशों तक हम आवश्यक दवाइयां पहुंचा पाए थे. ऐसे में भारत की वैक्सीन उत्पादन और डिलिवरी क्षमताएं भी इसी तरह मानवता के काम आएगी. इससे पहले पिछले महीने विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला और भारत सरकार के अन्य विशेषज्ञ प्रतिनिधियों ने दुनिया के 190 देशों के राजनयिकों को भारतीय वैक्सीन उत्पादन क्षमताओं पर एक विस्तृत प्रेजेंटेशन भी दिया था. इसके बाद ही राजनयिकों को उत्पादन क्षमता की बानगी दिखाने का यह कार्यक्रम बनाया गया. गौरतलब है कि भारत बायोटेक ने अपनी कोरोना वैक्सीन Covaxin को इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के साथ मिलकर तैयार किया है. कंपनी ने सात नवंबर को ही अपने कोविड-19 रोधी टीके के आपात उपयोग की मंजूरी हासिल करने के लिए केंद्रीय औषधि नियामक यानि ड्रग कंट्रोलर जनरेल ऑफ इंडिया में आवेदन किया है. वहीं हैदराबाद में करीब 300 करोड़ रुपए की लागत से अत्याधुनिक वैक्सीन निर्माण फेसेलिटी स्थापित करने वाली बायोलॉजिकल-ई कंपनी के साथ हाल ही में अमेरिका के ओहायो स्टेट इनोवेशन फाउंडेशन ने कोविड-19 वैक्सीन का लाइसेंस दिया है. भारत हाल के दिनों में एक प्रमुख थोक वैक्सीन निर्माता के रूप में उभरा है. दुनिया के 60 प्रतिशत टीकों का उत्पादन भारत ही करता है. दूसरे शब्दों में कहें तो दुनिया में इस्तेमाल होने वाले टीकों की तीन में से एक खुराक का उत्पादन भारत में होता है. इतना ही नहीं भारतीय फार्मा कंपनियां संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों के लिए दवाओं और टीकों की बड़ी आपूर्तिकर्ता हैं. इसके अलावा भारत स्वदेशी रूप से टीकों की एक पूरी नई श्रृंखला बनाने या संशोधित करने में भी बीते कुछ सालों के दौरान काफी सफल रहा है.

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