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उम्मीदों की कोपल

परेशानियों से घिरकर
झंझावतों को सहकर
फिर उठ खड़ा होना
यह तुमने सिखाया है
सूखने की कगार पर थे
तलवार की धार पर थे
कमजोर हो रही थी जड़े
फिर भी वजूद के लिए लड़े
संघर्ष को हथियार बनाकर
जीवन वापस पाया है
मुरझाकर फिर खड़ा होना
यह तुमने सिखाया है
बारिश की हर बूंदों के साथ
उम्मीदों ने फिर ली करवट
बिना थके बिना हारे चले तुम
थी तुम्हारी मंजिल दुर्गम पर्वत
पतझर के मौसम में भी
हरियाली का संदेश आया है
सब कुछ गंवाकर भी
मुस्कराना तुमने सिखाया है
परिस्थितियां थी विपरीत
पर विजय तुमने पाया है
लड़े तुम हर सांसो के साथ
गिरवी रखा अपना हर ख़्वाब
अनगिनत सवालों का
निकाल लाये तुम जवाब
तुम्हे ठोकरों पर रखने वाला
हर चेहरा मुरझाया है
रक्त के एक एक बूंद से
जड़ों को अमृतरस पिलाया है
भटकी हुई निगाहों को
रास्ता सही बताया है
जीवन को करे कैसे आलोक
यह तुमने सिखाया है


 दीप शर्मा  शिव चौक, धमतरी   

  

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