जिन हाथों से होती थी कचरे की बिनाई, अब उसी से होने लगी है कपड़ों की सिलाई

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रायपुर | एक बच्चे की माँ गौरी सोनी की सुबह हमेशा कूड़े-कचरे के बीच होती थी। जब शाम का सूरज ढलने लगता था, तब वह कूड़े-कचरे की ढेर से निकलकर घर को लौटती थी। कमोवेश सुजाता साहू की जिंदगी भी गौरी जैसी ही थी। सूरज निकलने से पहले और अस्त होने के पहले पूरा दिन कचरों के ढेर में ही गुजर जाता था। एक ओर जहा सभी ओर दिन के उजाले होते थे लेकिन इनकी जिंदगी उजालों के बीच भी अंधेरों में रहने के समान थी।

कचरों के ढेर में कुछ-कुछ सामान तलाशते-तलाशते अपनी दो जून की रोटी का जुगाड़ करना इनकी नियति बन गई थी। एक दिन प्रदेश के मुख्य सचिव आर पी मण्डल जब राजधानी के व्हीआईपी चौक से गुजर रहे थे, तब उनकी नजर कचरे के ढ़ेर में सामान तलाशते हुए महिलाओं पर पड़ी। कुछ महिलाएं अपने साथ बच्चे भी ली हुई थीं। उन्होंने अपनी कार रोकी और मैले कपड़े पहनी हुई कचरा बीनने वाली महिलाओं को अपने पास बुलाया। वे स्वयं भी कार से उतर गए और कचरा बीनने वालियों से उनके बारे में पूछने लगे। तब मुख्य सचिव श्री मण्डल ने उन्हें बताया कि राज्य शासन द्वारा आपके कल्याण के लिए योजना चलाई जा रही है। आप कब तक ऐसे ही कचरों में अपनी जिंदगी गुजारती रहोगी ? काम सीखों और आत्मसम्मान के साथ जीना सीखों। कचरा बीनने वालों पर मुख्य सचिव की नजर, इनकी जिंदगी के लिए मानों एक नई उम्मीद की किरण और एक नया सबेरा लेकर आई। कुछ दिन बाद ही नगरीय प्रशासन विकास और श्रम मंत्री डॉ शिवकुमार डहरिया ने कचरा बीनने वाली महिलाओं से उनकी ही बस्ती के पास मुलाकात की। उन्होंने श्रम विभाग की योजना से जोड़ते हुए कचरा उठाने वाली श्रीमती गौरी यादव, सुजाता साहू सहित कई महिलाओं को सिलाई मशीन सहित अन्य जरूरत के सामान दिए।

इनकी जिंदगी की नई सुबह की शुरुआत के बाद श्रम मंत्री डॉ. डहरिया की पहल इनकी अंधकारमय जिंदगी को नई रोशनी देने के साथ एक नई दिशा की ओर ले गई। उन्होंने इन कचरा बीनने वाली महिलाओं को श्रम विभाग की योजना से जोड़ते हुए इन्हें नुकसान से बचाने अपने ही हाथों से सभी को घर खर्च के लिए चेक भी दिए और सभी को सिलाई-कढ़ाई का अच्छे से प्रशिक्षण प्राप्त कर स्वरोजगार अपनाते हुए आत्मनिर्भर बनने और आत्मसम्मान के साथ जीने की सीख दी। आज लगभग दो महीने बाद गौरी, सुजाता सहित अन्य कई महिलाओं की परिस्थितियां बहुत बदल गई है। इनके हाथों में किसी के फेंके हुए कचरों के ढेर में समाई गंदगी नहीं बल्कि स्वच्छता और बीमारी से बचने का संदेश देने वाले हाथों से बनाएं मास्क, महिलाओं को सम्मान से जोड़ने वाला सलवार शूट, ब्लाऊज के परिधान के रुप में एक ऐसा हुनर भी है जो साफ-सुथरी भी है और धारण करने के योग्य है। रायपुर के सुभाष नगर इलाके में रहने वाली गौरी यादव ने बताया कि अब उनकी जिंदगी बदल चुकी है। कचरे के ढेर में अब वह नहीं जाती है। श्रम विभाग के माध्यम से मुझे 45 दिन का सिलाई का प्रशिक्षण मिला और नुकसान से बचाने प्रशिक्षण के साथ प्रतिदिन तीन सौ रुपए के मान से स्टायफंड भी मिला। उन्होंने बताया कि मंत्री डॉ. डहरिया सहित मुख्यसचिव आर. पी. मण्डल ने तब कहा था कि पुराने काम काज के बदले नया सम्मानजनक कार्य से उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आएगा। आज प्रशिक्षण के बाद मैं बहुत बदली हुई हूं। मैं गंदगी के ढ़ेर में कुछ काम का सामान तालाशती थी। उसे कबाड़ी में बेचकर जो रुपए मिलते थे उसी से घर चलता था। सुबह से लेकर शाम तक पूरा दिन कचरे के बीच ही गुजरता था। अब ऐसा नहीं है। मैंने मास्क सीले हैं और सलवार शूट, ब्लाऊज भी सिलाई करना सीख लिया है। गौरी यादव का कहना है कि यह काम पहले से लाख गुना अच्छा है। बच्चों के साथ घर में रहकर सिलाई का काम किया जा सकता है। पहले कचरे में सिर्फ गंदगी ही मिलती थी, भूखे-प्यासे भटकना पड़ता था। धूप-बारिश हो, सभी दिन बस इधर-उधर भटकना पड़ता था। अब स्वच्छ रहकर साफ-सुथरे कपड़ों की सिलाई करते हैं। उनका कहना है कि आने वाले दिनों में उम्मीद है कि वे भी एक बेहतर भविष्य बना सकेंगी। इसी तरह सुजाता साहू का कहना है कि हमें मंत्री डॉ डहरिया और मुख्य सचिव सहित अधिकारियों ने जब भरोसा दिलाया कि सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण एक दिन उनकी जिंदगी बदल सकती है तब जाकर मैंने और मेरे साथ अनेक कचरा बीनने वाली महिलाओं ने कचरा बीनना छोड़कर नई राह को चुना है।

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